
कटनी।। एक ओर मध्यप्रदेश सरकार गौ-सेवा और गौवंश संरक्षण को लेकर योजनाओं, अनुदानों और नई गौशालाओं के उद्घाटन के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर अमीरगंज गौशाला की तस्वीरें इन दावों को कठघरे में खड़ा करती नजर आ रही हैं। यहां बेजुबान गोवंश के साथ हो रही बर्बरता ने मानवता को शर्मसार कर दिया है। स्थानीय सूत्रों और सामने आई तस्वीरों के अनुसार गौशाला में बीमार गायों का समय पर इलाज नहीं कराया जा रहा। कई गायों के शरीर में कीड़े पड़ चुके हैं, घाव सड़ रहे हैं, लेकिन पशु चिकित्सा की कोई ठोस व्यवस्था नजर नहीं आ रही। भरपूर चारा, भूसा और स्वच्छ पानी के अभाव में गोवंश दम तोड़ता दिख रहा है। कई पशु इतने कमजोर हो चुके हैं कि खड़े होना भी उनके लिए मुश्किल हो गया है।
सरकारी दावे बनाम जमीनी हकीकत
प्रदेश सरकार गौवंश की रक्षा के लिए बजट, योजनाएं और निरीक्षण की बातें करती है, पर अमीरगंज गौशाला की हालत यह सवाल पैदा करती है कि क्या ये योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं? यदि सरकार और जिला प्रशासन नियमित निगरानी कर रहे होते, तो क्या गोवंश को इस पीड़ा से गुजरना पड़ता?
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि स्थानीय जिला प्रशासन और पशुपालन विभाग कहां है? क्या गौशाला संचालन में लापरवाही पर कोई जिम्मेदार तय होगा? क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी या फिर हर बार की तरह मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
मानवता की कसौटी पर व्यवस्था फेल
अमीरगंज गौशाला का यह दृश्य केवल एक संस्थान की विफलता नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर सवाल है। बेजुबान जानवरों की यह पीड़ा पूछ रही है कि जब सरकार गौवंश को माता कहती है, तो क्या उनकी देखभाल की जिम्मेदारी सिर्फ भाषणों तक सीमित है?
अब जरूरत है कि शासन-प्रशासन त्वरित संज्ञान ले, उच्चस्तरीय जांच कराए, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो और गौशालाओं में वास्तविक अर्थों में उपचार, पोषण और संरक्षण सुनिश्चित किया जाए—ताकि भविष्य में मानवता को फिर शर्मसार न होना पड़े।








