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जज्बा: भाई के बेटे को गोद लिया, PMO तक लड़कर पिता की जगह दर्ज कराया अपना नाम

इंदौर।  एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला ने तीन साल तक सिस्टम से लड़कर वह कर दिखाया जो आमतौर पर संभव नहीं है। महिला ने अपने गोद लिए बेटे के जाति प्रमाणपत्र में पिता की जगह अपना नाम दर्ज कराया है। चंदननगर की गली नंबर-6 में रहने वाली शबाना शाह अपने पिता के साथ रहकर मदरसा चला रही हैं। वर्ष 2006 में पति से तलाक के बाद से शबाना अपने पिता के साथ ही रह रही हैं। उन्होंने ताउम्र शादी नहीं करने का फैसला लिया और भाई अमजद शाह के बेटे मोहम्मद हाशिम को गोद ले लिया।

 

जब बेटे का जाति प्रमाणपत्र बनाने की बात आई तो उन्होंने खुद उसके नाम से अर्जी दी। प्रमाणपत्र तो बन गया लेकिन उसमें पिता की जगह शबाना के पिता लियाकत शाह का नाम आ गया। यानी बच्चे के नाना का नाम दर्ज हो गया। शबाना को यह मंजूर नहीं था। उसका मानना था कि इस सर्टिफिकेट के कारण बच्चे को भविष्य में दिक्कत आ सकती है। प्रमाणपत्र में बेटे की मां ही नहीं, पिता के रूप में भी वह खुद का नाम चाहती थीं।

इसीलिए उसने जिला प्रशासन के अफसरों को प्रमाणपत्र में संशोधन की अर्जी दी लेकिन अधिकारियों ने उसका काम करना तो दूर, हर बार उसे हतोत्साहित कर रवाना कर दिया। शबाना ने मीडिया से कहा- जितनी बार मुझे मना किया गया, मेरा इरादा उतना मजबूत होता गया। इस तरह वह एक लंबे संघर्ष की राह पर चल पड़ीं। उन्होंने मुख्यमंत्री हाउस से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक अपनी आवाज बुलंद की। शबाना के अनुसार अधिकारियों ने मुझे हाशिम के जैविक पिता के नाम से प्रमाणपत्र बनवाने पर जोर दिया। मैं ऐसा कर भी लेती तो हाशिम को भविष्य में हर जगह दिक्कत आती।

 ऐसे लड़ी लड़ाई

वर्ष 2015 में शबाना ने हाशिम के जाति प्रमाणपत्र के लिए फॉर्म भरकर दिया। शबाना ने पिता की जगह अपना नाम लिखकर दिया था लेकिन प्रमाणपत्र मिला तो हाशिम के पिता की जगह शबाना के पिता का नाम था।

संशोधन के लिए शबाना तत्कालीन एसडीएम संदीप सोनी के पास गई। उन्होंने मना कर दिया। वह तत्कालीन कलेक्टर पी. नरहरि से मिलीं। उन्होंने अपर कलेक्टर राखी सहाय को शबाना की मदद के निर्देश दिए।

एडीएम राखी ने शबाना को एसडीएम के पास भेज दिया। एसडीएम ने फिर नियमों का हवाला देकर नाम संशोधन से इनकार कर दिया। शबाना दोबारा कलेक्टर के पास पहुंच गईं। एसडीएम ने कहा कि वैध दस्तावेज नहीं हैं कि हाशिम शबाना का बेटा है।

इस पर शबाना ने फैमिली कोर्ट से हाशिम को गोद लेने की कानूनी प्रक्रिया पूरी की। कोर्ट ने शबाना के भाई और भाभी की सहमति के बाद शबाना को गोदनामा दिया।

गोदनामा रजिस्टर्ड कराने के बाद शबाना फिर कलेक्टर कार्यालय पहुंची। तब तक कलेक्टर नरहरि और एडीएम सहाय का तबादला हो चुका था।

गोदनामा लेकर वह एसडीएम के पास गईं। शबाना ने एसडीएम से कहा मैं ही हाशिम की अभिभावक हूं फिर क्यों सर्टिफिकेट नहीं बनेगा? एसडीएम ने कहा कि किसी हाल में नहीं बनेगा।

शबाना ने प्रधानमंत्री कार्यालय, मुख्यमंत्री कार्यालय, केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी, लोकसभा अध्यक्ष से शिकायत की।

शबाना ने जनसुनवाई में भी शिकायत कर दी थी। नए कलेक्टर निशांत वरवड़े ने एसडीएम बिहारीसिंह के पास भेजा। सोनी ने हाशिम का ओरिजनल जाति प्रमाणपत्र बुलवाकर रख लिया। ह शबाना जब बिहारीसिंह से मिली तो उन्होंने पुराना ओरिजनल प्रमाणपत्र मांगा। शबाना एसडीएम सोनी के पास पहुंची तो उन्होंने पुराना सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया।

शबाना ने हार नहीं मानी। इसी बीच उसकी शिकायत पर पीएमओ और सीएम हाउस से कलेक्टर के पास पत्र आना शुरू हो गए। इसमें एसडीएम से जवाब मांगा गया था।

उच्च स्तर से संज्ञान लेने पर एसडीएम ने तत्काल शबाना को बुलाया और नया सर्टिफिकेट जारी करने के लिए आवेदन-पत्र भरवाया।

शबाना ने नया आवेदन तो दिया लेकिन इस बात पर अड़ी रहीं कि हाशिम के पिता की जगह मेरा नाम आए। आखिर अधिकारियों को हाशिम की मां और पिता दोनों के रूप में शबाना का ही नाम दर्ज करना पड़ा। इस तरह 2018 में शबाना को उसकी लड़ाई का प्रतिफल मिला।

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