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इस शंकर मंदिर की वजह से ‘छोटी काशी’ के रूप में जाना जाता है ये शहर

 टिमरनी। मुगल शासक के बर्बर आक्रमण को सहन करने वाला नगर में स्थित सबसे प्राचीन शंकर मंदिर क्षेत्र के हजारों शिव भक्तों की आस्था का केंद्र है। 800 वर्ष पुराने विशालकाय वट वृक्ष के तले स्थित यह प्राचीन मंदिर क्षेत्र का सबसे प्राचीन शिव मंदिर की श्रेणी में आता हैं। इस मंदिर के चारों ओर पत्थरों की टूटी फूटी विशालकाय प्रतिमाएं इस बात को प्रमाणित करती है, कि मुगल शासन ने इस मंदिर पर भी आक्रमण कर इसे नेस्तनाबूत करने का प्रयास अवश्य किया था।
शिव मंदिर में भोलेनाथ के शिवलिंग के साथ – साथ मां बगलामुखी एवं बजरंगबली की प्रतिमाएं स्थापित है। वहीं गेट पर नंदी बाबा की आकर्षक प्राचीन प्रतिमा भी स्थापित है। इसी दरबार में मां रेणुका का दरबार भी हजारों भक्तों की आस्था का केंद्र है। मां रेणुका की आकर्षक व सिद्व प्रतिमा हर भक्त की मुराद पूरी करती हैं। नवदुर्गा महोत्सव व अन्य कार्यक्रमों के दौरान यहां पर कन्याभोज के विशाल कार्यक्रम किए जाते है। श्रावण का महीना शुरू हो चुका है। प्रतिदिन यहां सैकड़ों श्रद्घालु जल चढ़ाने के लिए पहुंचना शुरू हो गए हैं।
छोटी काशी के नाम जाना जाता रहा है नगर
ऐसा कहा जाता है, कि वर्षो पूर्व इस मंदिर में ख्यातनाम विद्वानों ने ठहरकर भगवान भोलेनाथ की आराधना की हैं। वहीं अपनी प्रज्ञा से लोगों को ज्ञान बांटा है। यहां पर इतने विद्वान संत महात्मा रहा करते थे, कि उनसे शास्त्रार्थ करने के लिए काशी, बनारस के विद्वान संत टिमरनी नगर में आते थे। यहां के विद्ववानों से शास्त्रार्थ करते थे इसीलिए इस नगर को छोटी काशी के नाम से भी पुकारा जाता रहा हैं।
पूर्व नप अध्यक्ष ने कराया था विकास कार्य
इस प्राचीन शंकर मंदिर परिसर के बाहर मंदिर परिसर को ओर बेहतर सौंदर्यीकरण की दृष्टि से बनाए जाने के लिए पूर्व नप अध्यक्ष सुभाष जायसवाल द्वारा अपनी परिषद के कार्यकाल में यह मंदिर के बाहर पेवरब्लाक व भक्तों के मंदिर में दर्शन के पश्चात बैठने के लिए आरामदायक बैंचे भी लगाई गई है। वहीं जायसवाल ने पिछले 6 वर्षों से श्रावण माह के प्रारंभ होते ही यह शंकर मंदिर में सुबह 5 बजे अभिषेक के लिए जाते हैं। जिन्होंने बताया कि यह मंदिर के कारण हमारा शहर छोटी काशी के नाम से पहचाना जाता है और शंकर मंदिर पर जो भी भक्त अपनी मुराद लेकर पहुंचते है उनकी मुराद पूरी होती है।

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