मानसून के 60 दिन बीते, प्रदेश में 60 सेंटीमीटर भी नहीं बरसा पानी

भोपाल. मध्यप्रदेश में मानसूनी सीजन के 60 दिन बीत चुके हैं, लेकिन अब तक 60 सेंटीमीटर बारिश भी नहीं हुई है। देश में इस साल सामान्य मानसून आकलन के बावजूद प्रदेश में कम बारिश के लिए तीन कारण बताए जा रहे हैं। पहला, मानसून का देर से सक्रिय होना। दूसरा, कमजोर वैदर सिस्टम। तीसरा, मानसून सिस्टम में लंबे-लंबे ब्रेक डाउन। मौसम विशेषज्ञ इसके लिए एक और कारण को जिम्मेदार मान रहे हैं, वह है ‘इंटर एनुअल वेरिएबिलिटी फीचर’। यानी हर बार एक साल के अंतर से मानसून एक अलग फीचर लेकर आता है। इसलिए इसका सटीक पूर्वानुमान नहीं लग पाता है।
 एक ओर प्रदेश में अल्प वर्षा की स्थिति है, वहीं प्रदेश के पड़ोसी राज्यों में कहीं भारी बारिश तो कहीं बाढ़ की स्थिति बन रही है। राजस्थान और गुजरात के उन इलाकों में इस बार बाढ़ की स्थिति सामने आई, जहां अक्सर कम और सीजन के आखिर में बारिश होती है। मानसून के अब सिर्फ 45 दिन शेष हैं, यदि इनमें भी ठीक से बारिश नहीं हुई तो प्रदेश में इस साल भारी जलसंकट होने की आशंका है। करीब एक पखवाड़ा देरी से आए मानसून के बाद वैदर सिस्टम में लंबे-लंबे ब्रेक डाउन के कारण अब तक बरसात के ज्यादातर दिन सूखे ही बीते हैं।
 प्रदेश में कम बारिश के लिए तीन कारण जिम्मेदार
 
1.ऑनसेट मप्र में 26 जून को (13 दिन लेट) आया, जबकि सामान्य स्थिति के लिए 13 जून को आ जाना चाहिए था। इस कारण जून के ज्यादातर दिन सूखे निकल गए।
 2. कमजोर वैदर सिस्टम बने। वायुमंडल के ऊपरी हवा पैटर्न ने इन्हें सपोर्ट नहीं किया। मानसून ट्रफ लाइन यूपी-बिहार की ओर आगे बढ़ गई और वहां ज्यादा बारिश हुई।
 3. मानसून में सामान्यत: 5 या 10 दिन का ब्रेकडाउन आता है, लेकिन इस साल 15-15 दिन के ब्रेक डाउन आए। इसलिए मानसून पीरिएड के ज्यादातर दिन सूखे गुजरे।
 
आगे उम्मीद
 मौसम वैज्ञानिकों की दलील है कि सीजन के आखिर तक सामान्य बारिश का कोटा पूरा होने की उम्मीद है। बंगाल की खाड़ी में उड़ीसा तट पर ऊपरी वायुमंडल में आए चक्रवातीय तूफान के कारण मानसून एक बार फिर से गति पकड़ेगा और नए रूप में सामने आएगा। 19-20 जुलाई को यह प्रदेश में दाखिल होगा। 21 जुलाई को भारी बारिश होने की संभावना है। अरब सागर में भी अब मानसूनी सिस्टम में सकारात्मक परिवर्तन दिख रहे हैं, जो सितंबर में बारिश का कारण बनेंगे।
 इस बार मानसून: कहीं भारी बारिश तो कहीं सूखे के रूप में दिख रहा है
 मानसून का देर से आना, वैदर सिस्टम को वायुमंडल की ऊपरी हवाओं का सहयोग न मिलना कम बारिश की मुख्य वजह है। बढ़ते प्रदूषण और ग्रीन हाउस प्रभाव के कारण बदल रही जलवायु एक्सट्रीम वैदर कंडीशन के रूप में सामने आ रही है। सामान्य से काफी ज्यादा गर्मी, काफी ज्यादा ठंड हम देख चुके हैं। – डीपी दुबे, पूर्व निदेशक, मौसम विज्ञान केंद्र, भोपाल 
 
मानसून हर एक साल के गैप के बाद एक अलग फीचर लेकर आता है। इसे इंटर एनुअल वेरिएबिलिटी कहते हैं। इस बार की वेरिबिलिटी यही है कि राजस्थान और गुजरात समेत देश के उन इलाकों में शुरुआत में भारी बारिश हुई जहां अक्सर कम और आखिर में बारिश होती है। – डॉ. अनुपम काश्यपि, निदेशक, मौसम विज्ञान केंद्र, भोपाल

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