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नंदीग्राम भले हार गईं ममता बनर्जी लेकिन CM बनने में नहीं है कोई दिक्कत, जानें क्या कहता है कानून

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत वह मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकती हैं। अनुच्छेद 164 (4) कहता है, "एक मंत्री जो लगातार छह महीने तक राज्य के विधानमंडल का सदस्य नहीं है, उसे पद छोड़ना पड़ेगा।" इसका मतलब यहा है कि ममता बनर्जी को छह महीने के भीतर किसी विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर आना होगा। 2011 में भी जब ममत बनर्जी ने पहली बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी,

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने प्रचंड जीत हासिल की है। हालांकि ममता बनर्जी खुद नंदीग्राम सीट से चुनाव हार गई हैं। शुभेंदु अधिकारी ने उन्हें करीब 1700 मतों से चुनाव हराया है।

हालांकि ममता और उनकी पार्टी ने कहा है कि वह इसके खिलाफ कोर्ट जाएंगी। टीएमसी सुप्रीमो भले ही चुनाव हार गई हैं, लेकिन मुख्यमंत्री बनने में कोई परेशानी नहीं है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत वह मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकती हैं। अनुच्छेद 164 (4) कहता है, “एक मंत्री जो लगातार छह महीने तक राज्य के विधानमंडल का सदस्य नहीं है, उसे पद छोड़ना पड़ेगा।”

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इसका मतलब यहा है कि ममता बनर्जी को छह महीने के भीतर किसी विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर आना होगा। 2011 में भी जब ममत बनर्जी ने पहली बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी, तब वह संसद सदस्य थीं। उन्होंने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था। कुछ महीनों के बाद, वह भबानीपुर से चुनी गई।

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कांग्रेस नेता और कानूनी विशेषज्ञ अभिषेक सिंघवी ने कहा, “कानूनी रूप से और नैतिक रूप से किसी को भी ममता बनर्जी के सीएम बनने और छह महीने के भीतर चुने जाने पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यदि कोई भी इसे मुद्दा बनाता है, तो यह उसके भारतीय संविधान के ज्ञान की कमी को दर्शाएगा। ”

आपको बता दें कि बंगाल में टीएमसी लगातार तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है। इस जीत ने ममता बनर्जी को यह एक गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस समूह में राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करता है। पूरे चुनाव में वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित बीजेपी राष्ट्रीय नेताओं को चुनौती देती हुई दिखी।

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ममता बनर्जी ने खुद को “बंगाल की बेटी” के रूप में पेश करने के अभियान पर ध्यान केंद्रित किया। इससे सरकार को लेकर सत्ताविरोधी माहौल कम हुआ।

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