किडनी की बीमारी है, तो सात घंटे से कम नहीं सोना

वॉशिंगटन। गुर्दे की बीमारी वाले लोग यदि पूरी और अच्छी नींद नहीं लें, तो उनकी बीमारी तेजी से बढ़ने का जोखिम अधिक होता है। यह जानकारी एक नए अध्ययन में सामने आई है। इसमें कहा गया है कि रोजाना रात को 6.5 घंटे से कम की नींद लेने पर स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
किडनी की समस्या गंभीर होने पर किडनी काम करना बंद कर देती है और बाद में यह किडनी फेल्योर का कारण बनता है। इसके रोगियों को डायलिसिस कराना होता है या किडनी ट्रांसप्लांट से गुजरना होता है। मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अन्य विकारों के कारण क्रॉनिक किडनी डिजीज हो सकती है। पिछले शोधों में पता चलता है कि क्रोनिक किडनी डिजीज से कैंसर होने का खतरा भी बढ़ सकता है।
पहले किए गए अध्ययनों से यह भी पता चला है कि किडनी के रोगियों में कम नींद की समस्या आम होती है। मगर, कुछ अध्ययनों ने साबित किया है कि नींद का असर रोग के बढ़ने पर पड़ता है। यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉइस में शिकागो के कॉलेज ऑफ मेडिसिन की डॉक्टर एना रिकार्डो और नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी में न्यूरोलॉजी एंड प्रिवेंटिव मेडिसिन की एसोसिएट प्रोफेसर क्रिस्टन नॉटसन ने यह शोध किया।
उन्होंने 431 रोगियों के सोने के समय, नींद की गुणवत्ता और क्रोनिक किडनी डिजीज के बढ़ने के संबंध के बारे में परीक्षण किया। प्रतिभागियों की औसत आयु 60 वर्ष थी, जिसमें 48 फीसद महिलाएं थी और आधे मरीज डायबिटीज के रोगी थे। प्रतिभागियों के सोने-जागने का पता करने के लिए उन्हें कलाई पर पांच से सात दिनों के लिए एसेलोमीटर पहनने के लिए कहा गया था। रिकार्डो ने कहा कि क्रोनिक किडनी डिजीज वाले रोगियों में नींद गंभीर रूप से कम हुई थी।
अध्ययन के नतीजों ने संकेत दिया कि प्रतिभागी औसतन प्रति रात 6.5 घंटे ही सो रहे थे। उनकी नींद के टूटने और किडनी फेल्योर के बीच जोखिम बड़ा था। पांच साल तक उन पर नजर रखने के बाद पता चला कि 70 प्रतिभागियों को किडनी फेल्योर हो गया था और उनमें से 48 की मृत्यु हो गई।

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