इन स्थानों पर करें पितरों का तर्पण मुक्त होंगे पितृ ऋण से

धर्म डेस्क। हिन्दू धर्म में पितरों को विशेष स्थान प्राप्त है। इन्हीं पितरों की शांति और संतुष्टि के लिए हर साल भाद्रपद महीने में कृष्णपक्ष के 16 दिन तक श्राद्ध पक्ष मनाया जाता है। इस दौरान लोग पूरी श्रद्धा के साथ श्राद्ध करते हैं। भारत में श्राद्ध करने के कुछ विशेष स्थान हैं।
गयाबिहार की राजधानी पटना से लगभग 100 किलोमीटर दूर फल्गु नदी के किनारे स्थित गया विशेष महत्व रखता है। पितरों के लिए यहां किया गया पिंडदान विशेष फलदायी माना गया है। पितृपक्ष के अवसर पर यहां 17 दिन का विशेष मेला लगता है, जहां देश विदेश से लोग पितरों को तर्पण करने के लिए आते हैं।
बद्रीनाथ
उत्तराखंड स्थित यह स्थान हिंदू धर्म के प्रमुख चार धामों में एक है। यहां साक्षात भगवान बद्री (विष्णु) विराजमान हैं। बद्रीनाथ के पास स्थित ब्रहमाकपाल सिद्ध क्षेत्र में पितृदोष मुक्ति के लिए तर्पण का विधान है।
प्रयाग (इलाहाबाद)
गंगा यमुना तथा सरस्वती नदी के संगम पर स्थित यह पुण्य क्षेत्र पितृपक्ष में विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि भगवान राम ने भी अपने पितरों का श्राद्ध यहीं पर किया था। प्रयाग में लोग अपने सगे संबंधियों के अंतिम संस्कार के बाद बचे राख को संगम के पवित्र जल में समाहित करने के लिए भी बड़ी संख्या में आते हैं।
काशी (वाराणसी)
पितरों के तर्पण के लिए काशी भी विशेष स्थान रखता है। भगवान विश्वनाथ की यह नगरी पूरे विश्व में अपने धर्म और आध्यात्मिक वातावरण के लिए प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यह नगरी भगवान शिव के त्रिशुल पर स्थित है। काशी में स्थित पिशाचमोचन कुंड पर विशेष माना जाने वाला त्रिपिंडी श्राद्ध होता है। यह त्रिपिंडी श्राद्ध पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद होने वाले व्याधियों से बचाकर मुक्ति प्रदान करता है।
चित्रकुट
भारतीय धर्म ग्रन्थों के अनुसार चित्रकुट में ही वनवास के समय रहने के अनुसार राजा दशरथ का निधन हुआ था। कहा जाता है कि यहीं पर भगवान राम ने त्रिवेणी घाट पर अपने पिता राजा दशरथ का पिण्ड दान किया था। इसलिए चित्रकुट का भी श्राद्ध में विशेष महत्व है।

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